Thursday, 29 March 2018

(9) ग़ज़ल


उसकी ही रहमत के बल पर हो गया
एक क़तरा  जो समन्दर हो गया

हाथ तेरा जिसके सर पर हो गया
औज पर उसका मुक़द्दर हो गया

अब बग़ावत हम पे लाज़िम हो गयी
अब तो पानी सर से ऊपर हो गया

ये सियासत है या कोई चाल है
क्यूँ फ़िदा  मुझ पर सितमगर हो गया

अश्क़ तेरे घर में माँओं के गिरे
हर तरफ़ मातम का मन्ज़र हो गया

जूँ न रेंगी क्यूँ तुम्हारे कान पर
तू भी जुमलों का सिकन्दर हो गया

साफगोई उसपे भारी पड़ गयी
अबतो 'पाठक' घर से बेघर हो गया

#ज्ञानेन्द्र'पाठक'

No comments:

Post a Comment

(10) ग़ज़ल

अपनी यादें तु ले के जा पगली रात दिन अब न तू सता पगली इश्क़ अपना तो है दिया जैसा ये ज़माना  तो है हवा पगली मुफ़लिसी ने मुझे दिखाया है...