Tuesday, 27 March 2018

(4) ग़ज़ल


शह्र आकर ये बात जानी है
ज़िन्दगी गाँव की सुहानी है

बूँद हूँ ओस की मगर मुझसे
क्यूँ समन्दर ने हार मानी है

इक समंदर से मिल के खो जाना
हर नदी की यही कहानी है

राहे उल्फ़त से तुम नहीं डिगना
इक यही अम्न की निशानी है

दर्द ने लम्स से कहा यारा
चोट दिल पर बहुत पुरानी है

या ख़ुदा   बख़्स दे मुझे दौलत
इक ग़ज़ल की किताब लानी है

इश्क़ सीरत से तुम करो 'पाठक'
रंग फ़ानी है रूप फ़ानी है
#ज्ञानेन्द्र पाठक

No comments:

Post a Comment

(10) ग़ज़ल

अपनी यादें तु ले के जा पगली रात दिन अब न तू सता पगली इश्क़ अपना तो है दिया जैसा ये ज़माना  तो है हवा पगली मुफ़लिसी ने मुझे दिखाया है...