Tuesday, 27 March 2018

(2) ग़ज़ल


इश्क़ यहाँ आज भी दो मुँही तलवार है
फिर भी हर इक आदमी इसका तलबगार है

जब से मिली आपसे मेरी नज़र तब से यार
चैन सुकूँ लुट गया नींद तड़ीपार है

वक़्त अगर पड़ गया ख़ुद ही समझ जाओगे
कौन यहाँ नासमझ कौन समझदार है

चुन के जिसे नाख़ुदा वक़्त ने पतवार दी
ऐसी डगर वो चला जो कि भँवरदार है

मन पे असर आपका तन पे ख़ुमार आपका
शब्द नहीं दे सका मौन मेरा प्यार है

राह ए वफ़ा पर बहुत ख़ार मिलेंगे तुम्हें
कल भी ये दुश्वार थी आज भी दुश्वार है

✒ज्ञानेन्द्रपाठक

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(10) ग़ज़ल

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