Wednesday, 28 March 2018

(8) कविता

कल जब मैं छत पर गया
अचानक मेरी नज़र
आम के एक छोटे से पेड़ पर पड़ी
सर पर बौर का मुकुट पहने 
वो
बिल्कुल एक नन्हा राजकुमार लग रहा था
बहुत खुश
बहुत आनंदित
आसपास के आम के पेड़ों को देखकर 
उनको मुँह चिढ़ाता
क्योंकि 
उनके पास अबकी मुकुट जो नहीं थे
उसको और पेड़
किसी ग़रीब के बच्चे की तरह
श्री विहीन 
उदास
और
दरिद्र 
लग रहे थे
वो इठलाता
बलखाता
चंचलता से भरा 
उन पेड़ों की पीड़ा को कुरेदता
जैसे कोई किसी के पुराने जख्मों को कुरेदता है
पर उसके इस अल्हड़ बचपने को अनदेखा कर
वो पेड़ अपनी मस्ती में मस्त
जैसे कोई साधु 
किसी दुर्जन व्यक्ति की 
दुष्टता को देख कर भी 
अनदेखा कर देता है
वैसे ही 
और पेड़ अपने उस नन्हे साथी की सारी 
भूलों
गलतियों 
और
शरारतों को 
देखकर भी 
अनदेखा कर दे रहे थे
वो शायद अपना 
पिछला साल
भूल गया था
जब उसके पास मुकुट नहीं था
खूब सुबक-सुबक कर रो
रहा था 
यही नन्हा पेड़
तब इन्हीं साथियों ने 
संभाला था इसे
तब इन साथियों ने ही 
इसे समझाया था
बताया था 
कि 
सुख-दुःख
रूप-रंग
धन-दौलत 
धूप और साये की तरह 
आते जाते रहते हैं
जब तुम दुःख में हो 
तो ज्यादा मत परेशान होना
और सुख में 
ज्यादा न इतराना
क्या हुआ
अगर 
तुम्हारे पास मुकुट नहीं है
कोई बात नहीं
हमारे पास तो है
अपना ही समझना
हम और तुम 
कोई अलग हैं क्या?
और 
सभी पेड़ कहने लगे थे
हे ईश्वर!
अगले बरस हम सबको 
भले ही मुकुट न देना
लेकिन
हम सब इसे ऐसे 
सुबकते 
रोते-बिलखते
नहीं देख सकते
इसको 
एक अच्छा सा मुकुट देना
शायद 
उन सब की 
दुआओं 
के असर पाने से ही 
इस बार
वो राजकुमार बना है?
लेकिन 
ये नन्हा राजकुमार
शायद
इन बातों को
भूल चुका है?
या 
अपने मुकुट के मद में चूर 
किसी मदान्ध हाथी की तरह
अपने साथियों की भावनाओं 
को अपने पैरों तले कुचलता हुआ आगे बढ़ा जा रहा है
लगता है
बौर आने पर सचमुच बौरा गया है मुआ
बौर की बौराहट उसके सर चढ़कर बोल रही है
दम्भी बसन्त का आगमन हो गया है
काश! इसे अपना अतीत याद आ जाता......
काश! इसे अपना अतीत याद आ जाता....
#ज्ञानेन्द्र'पाठक'

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