Wednesday, 28 March 2018

(6) ग़ज़ल


आईने जब से आजकल निकले
सब यहाँ सूरतें बदल निकले

आपकी याद रोज़ आती है
छोड़ तन्हा कहाँ को चल निकले

आ गया मैं तुम्हारी महफ़िल में
अब तो मुश्किल का कोई हल निकले

क्या पता कौन कब कहाँ आखिर
आपकी जिंदगी बदल निकले

चाँद तारे हसीं नज़ारे सब
तेरी यादों के साथ चल निकले

क्या बता पायेगा यहाँ कोई
कैसे धरती से यार जल निकले

नैन तेरे हसीन है इतने
जैसे दरिया में दो कँवल निकले

तुम सताओ मुझे सुनो इतना
कोई अच्छी सी इक ग़ज़ल निकले

✒ ज्ञानेन्द्र पाठक

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