दिखावा हर तरफ़ आसूदगी का
कहीं मंज़र नहीं है बेहतरी का
हो शामिल दर्द इसमें हर किसी का
तभी मकसद हो पूरा शाइरी का
हमारी गुल्लकें खाली पड़ीं हैं
भला क्या दोष है कूजागरी का
दग़ा अपना लहू देने लगा है
भरोसा अब करें कैसे किसी का
वो हर लम्हा है भारी इक सदी पर
जो ख़र्चा साथ तेरे,ज़िन्दगी का
वो धागा नाप तो ले के गया पर
रहा आबाद ग़म अंगुस्तरी का
मुसलसल याद आता है ख़ुदा बस
यही है फ़ायदा फ़ाकाकशी का
बतायेंगे तुम्हें फुरसत में 'पाठक'
मिला मुझको सिला क्या आशिक़ी का
✒ज्ञानेन्द्र'पाठक
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